Agra News: करीब 400 करोड़ रूपये की लागत से तैयार किया गया आगरा का उत्तरी बाईपास शहर को भारी वाहनों के दबाव से राहत देने के उद्देश्य से बनाया गया था, लेकिन पूरी तरह चालू होने के बाद भी यह बाईपास उपयोग में नहीं आ पा रहा है। नतीजा यह है कि आज भी भारी ट्रक, कंटेनर और बड़े वाहन शहर के घनी आबादी वाले इलाकों से होकर गुजर रहे हैं, जिससे सड़क हादसों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।
इस गंभीर स्थिति को लेकर सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता केशी जैन ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब उत्तरी बाईपास पूरी तरह तैयार और चालू है, तो फिर शहर के भीतर से भारी वाहनों का आवागमन क्यों हो रहा है।
उत्तरी बाईपास चालू, फिर भी ट्रक शहर में क्यों?
चार दिसंबर 2025 को आगरा का उत्तरी बाईपास औपचारिक रूप से पूरी तरह खोल दिया गया था। यह बाईपास लगभग 14 किलोमीटर लंबा है और दिल्ली से कानपुर व आगे जाने वाले वाहनों के लिए इस वैकल्पिक मार्ग के रूप में विकसित किया गया था, ताकि शहर के अंदर यातायात का दबाव कम हो सके। और शहरवासियों को कोई परेशानी न हो।
इसके बावजूद प्रतिदिन करीब 50 हजार वाहन आगरा शहर के भीतर से गुजर रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या में भारी वाहन भी शामिल हैं। ये वाहन स्कूलों, अस्पतालों, रिहायशी इलाकों, सब्जी मंडियों और ऐतिहासिक स्थलों के पास से तेज गति में निकलते हैं, जिससे आम नागरिकों की जान जोखिम में बनी रहती है। फिर भी कोई इस बारे में एक्शन नहीं ले रहा है।
सड़क हादसों के आंकड़े चिंता बढ़ने वाले
आगरा देश के उन 100 शहरों में शामिल है, जहां सबसे अधिक सड़क हादसे होते हैं। वर्ष 2025 में ही आगरा में 1350 से अधिक सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 700 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। सड़क दुर्घटनाओं में शून्य मृत्यु के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रशासन ने जिले में तीन क्रिटिकल कॉरिडोर चिह्नित किए हैं और 208 ब्लैक स्पॉट्स की पहचान की गई है। इसके बावजूद, भारी वाहनों को शहर से बाहर रखने के नियम ( जैसे नो-एंट्री जोन ) बनाए गए थे, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में उठी व्यवस्था और तालमेल की कमी
जनहित याचिका में साफ कहा गया है कि समस्या संसाधनों की नहीं, बल्कि व्यवस्था और तालमेल की कमी की है। उत्तरी बाईपास का मुख्य मोड रैपुरा जाट क्षेत्र में पड़ता है, जो मथुरा जिले की सीमा में आता है। यही से यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि भारी वाहनों को बाईपास पर मोड़ने की जिम्मेदारी किस प्रशासन की है। न तो आगरा जिला प्रशासन और न ही मथुरा जिला प्रशासन इस बिंदु पर पूरी जिम्मेदारी ले रहा है। जिलों के बीच स्पष्ट समन्वय और निर्देशों की कमी के कारण बाईपास का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा।
सिर्फ चार किलोमीटर का अंतर, फिर भी शहर से रास्ता
याचिका में यह भी बताया गया है कि भारी वाहन यदि रैपुरा जाट से कुबेरपुर तक शहर के बीच से जाते हैं, तो दूरी लगभग 34 किलोमीटर पड़ती है। वहीं, यदि वही वाहन उत्तरी बाईपास और यमुना मार्ग से होकर जाएं, तो दूरी लगभग 38 किलोमीटर होती है। यानी अंतर सिर्फ चार किलोमीटर का है। इतनी मामूली दूरी बचाने के लिए भारी वाहन शहर के भीतर घुस रहे हैं, जिससे दुर्घटनाओं का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
बाईपास का उद्देश्य और हकीकत में अंतर
उत्तरी बाईपास का मूल उद्देश्य शुरू से ही स्पष्ट था- जो भारी वाहन आगरा नहीं जा रहे है, वे शहर में प्रवेश न करें। इसके बावजूद आज स्थिति यह है कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर ट्रैफिक का दबाव जस का तस बना हुआ है, जबकि बाईपास खाली पड़ा है। लोगों का कहना है कि यदि बाईपास पर सख्त निगरानी, उचित संकेतक, और ट्रक डायवर्जन की प्रभावी व्यवस्था लागू कर दी जाए, तो शहर के भीतर यातायात का दबाव अपने आप कम हो सकता है।
Agra News: समाधान क्या हो सकता है?
जनहित याचिका में सुझाव दिया गया है कि
- भारी वाहनों के लिए टाइम-बेस्ड या पूर्व प्रतिबंध लागू किया जाए
- बाईपास पर प्रवेश बिंदुओं पर स्थायी पुलिस व ट्रैफिक टीम तैनात की जाए
- जिलों के बीच स्पष्ट प्रशासनिक जिम्मेदारी तय की जाए
- ट्रक चालकों के लिए स्पष्ट साइन बोर्ड और मार्गदर्शन व्यवस्था की जाए
यदि इन उपायों पर अमल किया जाता है, तो उत्तरी बाईपास का उपयोग स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा और शहर के भीतर यातायात का दबाव कम होगा।
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